कहीं तनहाई…
कहीं जुदाई…
कहीं शरीर…
कहीं आत्म…
क्यों है ये समंदर दर्द का ?
क्यों हर शक्स परेशा सा दिखता है ?
क्यों है उदासियाँ उतरती दिलो में कही ?
एक दिन जो हुआ सामना इससे पूछ बैठ में नादाँ...
क्यों आते हो तुम,
बसने को हमारे बीच,
क्या मिली नही तुम्हे,
रहने को जगह कोई और ?
है इतना बड़ा जो ये ब्रह्माण्ड,
जा कर क्यों नही रहता,
कहीं तू शांत,
क्यों है करता परेशान ?
मेरे बंधुवों को तू शैतान !
आंखें हुई नम उसकी,
अन्स्सो दो चालाक गए उसके,
रोता हुआ वो बोला मुझे…
ए बंधु क्या करूं में !
दर्द हूँ मई बाहर से भीतर,
दर्द है भरा मुझमे जग का सारा,
इस दर्द की पीधा से तड़पता हूँ,
आता हूँ इंसानों की बीच,
तलाशता में सदियों से कहीं…
कोई तो इन्सान मिलेगा कभी,
देने को एक सुकून कहीं,
देगा कुछ खुशियाँ,
देगा कुछ मुस्कुराह्तें,
क्या है मेरा नसीब !
तड्पना ता-जिन्दगी…
क्या दर्द को है हक नही,
मुस्कुराने का कभी...
क्या होगी ये तलाश ख़त्म कभी,
मिलेगा क्या वो इंसा कभी...
Thursday, August 23, 2007
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