Friday, February 19, 2016

उस ठंडी ओस की महक ये हवाएं ले आएं शायद,
वह गुनगुनाती धुप की गर्माहट पहुंच जाए शायद,
उस कठोर पर्वत के पार कहीं घोंसला है मेरा,
शाम के ये बयार मेरा संदेशा ले जाये शायद. 
सर्द हवाओं ये एहसास दिलाती हैं,
की रिश्तों की गर्माहट कहीं खो गयी है,
पगडंडियों की नरम जमीं,
एक सख्त सड़क हो गयी है,
जिससे इंसान की तरह जानते थे हम,
उस आदमी से इंसानियत जुदा हो गयी है. 
चढ़ती थी उस मज़ार पर चादरें बेशुमार,
और बाहर बैठा एक फ़क़ीर सर्दी से मर गया.... 
बुलंदियों को पाने की खाहिश तो बहुत थी,
लेकिन,
दूसरों को रौंदने का हुनर कहाँ से लाता...?
मैं गिर न जाऊं कहीं, मुझको थोड़ा और सम्भालो तुम,
मैं प्यासा  ही रहा, दो बूँद हलक में और डालो तुम,
तुम पास हो मेरे, मुझको यकीन हमेशा से हैं,
पर दिल भरता नहीं, थोड़ा करीब और बुलालो तुम.

ये राहें मुश्किल तो हैं बहुत पर नामुमकिन नहीं ऐ  दोस्त,
बस मेरे साथ अपने भी कदम मिलो तुम,
इन् पग डंडियों के सारे कांटे चुन ही लेंगे हम,
बस ये ख्याल रखना, कोई फूल कहीं कुचल न डालो तुम.

मुझे जन्नत से काया वास्ता बस इतना ही काफी है,
की में तेरे कन्धों पे रखूँ अपना सर,
और मेरे हाथों में अपना हाथ डालो तुम. 
जिंदगी तू हंसी बड़ी दूर से नज़र आती हैं,
जितना पास जाओ उतना दूर नज़र आती हैं....
मुझे अपने दामन में जो चीज़ नहीं मिल पायी,
वह क्यों गैरों के पहलु में नज़र आती हैं,
तू चाहे जितना भी सितम कर मुझ पर,
मेरे दिल में अभी भी कुछ सब्र बाकी हैं,
मैंने कभी तुझसे कोई शिकवा नहीं किया ऐ  जिंदगी,
फिर तुझे क्यों मुझ में ही कमी  नज़र आती है,
तू मेरे ख़्वाबों को चाहे अलग कर दे मुझसे,
मेरी हक़ीक़त मेरे ख़्वाबों के करीब रहती है,
मुझे मालूम नहीं मुझसे तू चाहती क्या है,
तेरी तरफ से हर रोज़ नयी नयी मांग निकल आती है,
कभी बैठ मेरे साथ किसी शब-ए जिंदगी,
गम डुबो दे जनम में अपने
जब तक के सहर आती नहीं है.