Sunday, September 30, 2007

आलिंगन

चल ऐ इन्सान समां जाएँ आज,
दे दे बाहें अपनी भर बाहों में मेरी,
आलिंगन कर डूब जायें आज हम कुछ ऐसे,
आज मैं तुझमे और तू डूब जाये मुझमें,

आलिंगन हो दुनिया का अनोखा सम्पूर्ण,
दुनिया भी रह जाये देखती नि:शब्द,
चल आज कर ले आलिंगन कुछ ऐसा,
रच दें परिभाषा आलिंगन की एक नयी,

चाह्चहआहटों से भर जाये वन उपवन,
चिडियों का हो छाया घनेरा कुछ ऐसा,
संगीत से उनके गूँज उठे कुदरत का हर एक कोना,
कोयल की कूक से खिल नाच उठे जीव सारे,

खिल जाये पत्ता पत्ता थाम कली को भी डाली,
नाच उठे हर एक पशु वन में हो मदमस्त,
चल पड़े बयार भी हवा की कुछ ऐसे,
वातावरण भी मुस्कुरा उठे खिलखिला कुछ आज,

चल आ कर लें आज हम आलिंगन कुछ ऐसे,
नदियों में भी आ जाये कुछ ऐसे बल,
लहरा कर चल पड़े जैसे एक मदमस्त भंवर,
पुष्पों के नशीले अधरों पर रख अपने वो अधर,

लहराती बलखाती क़मर हो जैसे सुंदरी,
जाती हो पनघट पर लिए अपनी मटकी,
बहते हुए जल में भी आ जाये ऐसी एक खुमारी,
बहाव में हो एक नृत्य का आलिंगन करती वो प्यारी,

चल कर लें आलिंगन हम इंसानियत का आज,
दबोच आज अपनी बाहों में कुछ ऐसे,
लग जायें हम गले उसके खींच सीने में अपने,
समा लेने दे आज मुझे इंसानियत को खुद में,

चल आ कर ले आलिंगन आज कुछ ऐसे,
आ जाये खुदा भी धरती पर देखने ये मंज़र,
संगम इंसानियत का मनुष्य में समाता,
आलिंगन कुछ ऐसा खिल जायं जिसमें डूबें हम सारे ॥

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